Friday, January 9, 2009

पैराहन (नज़्म)


मैं तो आज भी
ढक  कर रखता हूँ
तेरे दिए जख़्मो को
कहीं वक़्त की हवा लगे
तो सूख ना जाएँ.
एक यही तो तेरी
निशानी बाकी है मेरे पास.

मुझे पता है
एक जख्म तूने भी
अपने पास रखा है
जो रिस्ता रहता है
हर वक़्त..

तूने जो हँसी का पैराहन* 
इसपर डाल रखा है ना...
वह बहुत गीला है..!!

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*पैराहन = कपडा
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3 comments:

संत शर्मा said...

Waah, Lajabab

VaRtIkA said...

waah!

Hussain Haidry said...

Behad saada lafz aur khoobsoorat khayaal! Mujhe behad khushi ho rahi hai aapka blog padhkar! Aapko Ghazalo aur Nazmo ke liye bahut mubaarakbaad!