Tuesday, April 12, 2011

Ek Nazm..


सुना है पानी की इक खासियत है
कि उसमे डूबना पहले पहल
मुमकिन नहीं होता
वो हर डूबी हुई चीज़ों को ऊपर फेंकता है

कभी हम तुम भी फुरक़त* के
समंदर में हुए थे गर्क*

वो बीता वक़्त वो लम्हें
जो हम संग लेके डूबे थे
बड़े भारी थे जाना

और हमको जिस्म प्यारा था !

तो उनको छोड़कर
हम फिर से लौटे हैं सतह पर
और इस दुनिया में वापस आगये हैं
सभी से मिल रहे हैं
रो रहे हैं
हंस रहे हैं
मगर इक फर्क दिखने लग गया है...

कि जब भी देखता हूँ आईना मैं
तो उसमे मुझको अब फूली हुई इक लाश दिखती है !!
.........................................................
 [फुरक़त -- Parting, Separation]; [गर्क -- Drown]
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7 comments:

रश्मि प्रभा... said...

कि जब भी देखता हूँ आईना मैं
तो उसमे मुझको अब फूली हुई इक लाश दिखती है !!
........ gajab ke ehsaas

' मिसिर' said...

मुहब्बत का तकाज़ा है कि डूबो और न फिर उभरो ..............

लेकिन गर्क हो जाना हमेशा मुमकिन नहीं होता !
आपकी बात से पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूँ और
इस खूबसूरत नज़्म के लिए दाद पेश करता हूँ !

सुनील गज्जाणी said...

कि जब भी देखता हूँ आईना मैं
तो उसमे मुझको अब फूली हुई इक लाश दिखती है !!
behad sunder abhivyakti ,
sadhuwad

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (14-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

वीना said...

कि जब भी देखता हूँ आईना मैं
तो उसमे मुझको अब फूली हुई इक लाश दिखती है

बहुत सुंदर एहसास...बहुत मार्मिक

Lams said...

Rashmi Didi shukriya pasand karne keliye.

Misir Ji is hausla afzaayi ka bahut bahut shukriya

Sunil ji tah-e-dil se shukriya

Vandana Ji is sammaan ke liye dil se shukriya. Main zaroor aunga.

Veena Ji nazm pasand karne keliye bahut bahut shukriya.

'Lams'

Anonymous said...

Quite a serious one
Nice.