Saturday, February 6, 2010

I-4 / आई-४


घर के बरामदे मे लगे हुए
टाट के पर्दों से
छन कर आती हुई
मेरे बचपन की धूप..!!

और बरामदे से जुड़ता हुआ
वो शैतान आगन,
एक बात नही सुनता था
माँ के सोते ही
कड़ी धूप में
बचपन भुनाने निकल पढ़ता..!!

उस आगन मे पिछली तरफ,
बल खाता हुआ कचनार का पेड़,
आगन की शैतानियों में
बराबर का हिस्सेदार,
न जाने कितनी चोटों के निशाँ
उसकी शैतानियों की गवाही
आज भी देते हैं..!!

कचनार के दूसरी तरफ,
एक बूड़ा चुगलखोर दरवाज़ा,
जिसपर इतने प्लास्टर
चढ़ चुके थे..की
हाथ लगाते ही चिल्लाने लगता..

और माँ जाग जाती..!!

उस दरवाज़े के पीछे
छोटी छोटी मासूम क्यारियाँ
जहाँ ना जाने कितनी
दोपहर बो रखीं हैं मैने..!!

उनकी बाईं ओर..
एक मदमस्त लॉन
जिसपर बारीकी से
देखने पर पता चलता था
की उसपर
कुछ ज़िंदगी के निशान बाकी हैं..
शायद
क्रिकेट की दीवानगी ने
उसे ऐसा बना डाला था..!!

और उस लॉन का रखवाला..
वो बूड़ा पीपल,
जिसपर इल्ज़ाम था,
की एक दिन वह
उस घर को गिरा देगा
जिसके साथ
वह बरसों से रहता आया है,
कुछ हुक्मरानो के आदेश भी आए थे..
...
सुना है उनके हुक्म की
तामील हो चुकी है..!!
.
पीपल के सामने से होते हुए
मेरे घर का दरवाज़ा आता था..
जिसके अंदर जाते ही
एक छोटा सा गलियारा,
और उसमे रखा एक
सुस्त टेलिफोन
जो हर आने जाने वालों को
सुस्त निगाहों से देखकर
फिर आँखें मूंद लेता..!!

उस छोटे से गलियारे के दूसरी तरफ,
एक और दरवाज़ा
जिसके पार
वही टाट का परदा
वही आगन
वही कचनार का पेड़..

बस फ़र्क़ इतना है,
की यह लोग
अब मुझे नही पहचानते..!!
.............................

3 comments:

Udan Tashtari said...

क्या क्या याद दिला गई यह रचना..


बहुत खूब!

संजय भास्कर said...

हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

संजय भास्कर said...

behtreen rachnaa