Sunday, April 12, 2009

बनके ख़ुशी वो आये थे...



बनके ख़ुशी वो आये थे जो मेरे पास में,
धोखा दिया था आये थे गम के लिबास में,

वो घुट रहे थे इस कदर मेरे जेहन में बस,
की गांठ बनके बंध चुके थे मेरी सांस में,

मंजिल पे पांव रख चुका होता मैं अबतलक,
खोया अगर न होता मैं जो दश्त-ऐ-यास* में,

एक शख्स बद-गुमानियों* के घर में जा बसा,
जीता रहा था शख्स वो खौफ-ओ-हिरास* में,

और इस चुभन से पा चुका होता निजाद दिल,
यादें छुपी न होती गर इस दिल की फांस में,

रिश्ता मुकम्मल होगया होता ऐ जान-ऐ-'लम्स',
रखते न गुंजाइश अगर इसकी असास* में.

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dasht-e-yaas -- jungle of despair
bad-ghumaanee -- Suspicion
khauf-o-hiraas -- terror/fear
asaas -- foundation/neev
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5 comments:

अनिल कान्त : said...

मोहब्बत ही है जो तमाम दर्द लिए हुए है और राहत भी ...
आपकी रचना कमाल की है ....बहुत अच्छा लिखते हैं आप

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

रश्मि प्रभा said...

bahut hi sundar rachna.....

संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छा लिखा आपने।

shama said...

Behtareen rachnaa...lekin ek baat galat keh gaye..."gamke libaasme wo aaye.."...nahee, gamke libaasme aate to aap pehchaan jaate,gam khushiyonkaa libaas pehen aate hain, aur ham chhale jaate hain..
Kahaniya na sahee..ye ati sundar rachna padhne milee..
snehsahit
shama

Shayaar said...

Shukriyaa mitron. Shama ji sujhaav ke liye bahut bahut shukriya. Aur ab aapko kahaaniyan bhi milti rahengi...

--Gaurav