Monday, June 21, 2010

जो मुझसे हुई है खता-ए-मोहब्बत..!!


जो मुझसे हुई है खता-ए-मोहब्बत,
तो इसमें सज़ा भी सज़ा-ए-मोहब्बत,

है दुनिया मे बस एक दवा-ए-मोहब्बत,
जिसे बोलते हैं दुआ-ए-मोहब्बत,

नज़रबंद कर के मुझे अपने दिल में,
लगा दी गयी है दफा-ए-मोहब्बत,

घरों को जलाने से होगा क्या हासिल,
जलाते नहीं क्यूँ शमा-ए-मोहब्बत,

मैं जी भरके जी लूँ तमन्नाएं सारी,
न जाने की क्या दिन दिखाए मोहब्बत,

वो दौलत ओ शोहरत कि शौकीन है पर,
यहाँ मुफलिसी, बस वफ़ा-ए-मोहब्बत..!!
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6 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया/

अरुण 'मिसिर' said...

वाह ,
जो मुझसे हुई है
ख़ता-ए-मुहब्बत,
तो इसकी सजा भी
सजा-ए-मुहब्बत।

बहुत खूबसूरत गज़ल
आपकी जानिब से

वन्दना said...

वाह्…………एक अलग ही अन्दाज़ मे बहुत ही सुन्दर गज़ल्।

Mukesh Kumar Sinha said...

Lajabab, umda......:)

Maria Mcclain said...
This comment has been removed by a blog administrator.
utkarsh said...

excellent very nice